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बस हादसे में घायल महिला को मिला 29 लाख का मुआवजा! कोर्ट ने इंश्योरेंस कंपनी को लगाई फटकार

मुंबई की एक महिला को सड़क हादसे में लगी चोटों के बाद इंश्योरेंस कंपनी ने मुआवजे से इनकार कर दिया, लेकिन जब कोर्ट में पेश हुआ विकलांगता प्रमाणपत्र, तो फैसला पूरी तरह पलट गया। जानिए कैसे 85 हजार सैलरी वाली इस महिला को 29 लाख का हक मिला और इंश्योरेंस कंपनी की सारी चालें हो गईं फेल!

By Saloni uniyal
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बस हादसे में घायल महिला को मिला 29 लाख का मुआवजा! कोर्ट ने इंश्योरेंस कंपनी को लगाई फटकार
बस हादसे में घायल महिला को मिला 29 लाख का मुआवजा! कोर्ट ने इंश्योरेंस कंपनी को लगाई फटकार

महाराष्ट्र (Maharashtra) के ठाणे जिले में एक सड़क हादसे का शिकार हुई महिला को आखिरकार न्याय मिल गया है। 50 वर्षीय हेमा कांतिलाल वाघेला को मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) ने 29 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। इस मामले में खास बात यह रही कि शुरूआत में इंश्योरेंस कंपनी ने महिला के दावे को ठुकरा दिया था, लेकिन विकलांगता प्रमाणपत्र के बाद फैसला उनके पक्ष में आया। हादसे के समय महिला की मासिक सैलरी 85,088 रुपये थी।

न्यू ईयर पार्टी से लौटते वक्त हुआ हादसा

घटना 1 जनवरी 2018 की सुबह की है। मुंबई निवासी हेमा वाघेला अपने दोस्तों के साथ 31 दिसंबर 2017 की रात न्यू ईयर सेलिब्रेशन के लिए एक प्राइवेट बस से नरीमन पॉइंट गई थीं। लौटते समय सुबह बस हादसे का शिकार हो गई। हादसे में हेमा को गंभीर चोटें आईं और उन्हें तुरंत जसलोक अस्पताल में भर्ती कराया गया। लंबे समय तक इलाज चला और वे सामान्य जीवन में लौटने के लिए संघर्ष करती रहीं।

बस ड्राइवर के खिलाफ दर्ज हुआ केस

हादसे के बाद पुलिस ने बस चालक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 279 (लापरवाही से तेज वाहन चलाना), 337 (दूसरे की जान को खतरे में डालना) और 338 (गंभीर चोट पहुंचाना) के तहत मामला दर्ज किया। जांच में सामने आया कि बस चालक के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था। साथ ही बस का कोई फिटनेस सर्टिफिकेट और रूट परमिट भी नहीं था। ये सभी तथ्य इंश्योरेंस क्लेम में बाधा बने।

इंश्योरेंस कंपनी ने पहले किया था दावा खारिज

हेमा वाघेला ने MACT में 53.95 लाख रुपये के मुआवजे की मांग करते हुए मोटर दुर्घटना दावा दायर किया। उन्होंने कहा कि हादसे के समय वे एक कंपनी में सलाहकार (Consultant) के पद पर कार्यरत थीं और उनकी मासिक आय ₹85,088 थी। हालांकि, इंश्योरेंस कंपनी ने यह कहते हुए क्लेम का विरोध किया कि हेमा को केवल चोटें आई हैं और कोई स्थायी विकलांगता नहीं है।

विकलांगता प्रमाणपत्र बना न्याय की चाबी

मामले में तब नया मोड़ आया जब हेमा ने कोर्ट के समक्ष 30% स्थायी विकलांगता का प्रमाणपत्र पेश किया। इसके बाद MACT की सदस्य एस.एन. शाह ने 18 मार्च 2025 को निर्णय सुनाते हुए इंश्योरेंस कंपनी और बस मालिक को संयुक्त रूप से ₹29 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया। साथ ही यह भी कहा गया कि इस राशि पर याचिका दायर करने की तारीख से भुगतान की तारीख तक 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

महिला की सैलरी और पेशेवर स्थिति बनी गणना का आधार

MACT ने अपने आदेश में हेमा की मासिक आय को ध्यान में रखते हुए नुकसान की गणना की। ₹85,088 की सैलरी के आधार पर अनुमानित भविष्य की आय में कमी, इलाज का खर्च, मानसिक पीड़ा और विकलांगता से जुड़े कष्टों को शामिल कर मुआवजा तय किया गया। यह निर्णय उन तमाम मामलों के लिए उदाहरण बन सकता है, जहां दुर्घटना में घायल व्यक्ति को स्थायी नुकसान होता है।

ड्राइवर की लापरवाही और बस की अनियमितताएं बनीं बड़ी वजह

इस मामले में बस ड्राइवर की लापरवाही और वैध दस्तावेजों की कमी ने कंपनी के पक्ष को कमजोर कर दिया। फिटनेस सर्टिफिकेट और रूट परमिट की अनुपस्थिति ने MACT को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि बीमाकर्ता और बस मालिक दोनों की जिम्मेदारी बनती है। यह मामला उन निजी बस ऑपरेटरों के लिए भी चेतावनी है, जो बिना उचित अनुमति और फिटनेस के वाहन चलाते हैं।

न्याय में देरी, पर न्याय मिला

हालांकि हेमा वाघेला को यह मुआवजा पाने में लगभग सात साल का वक्त लग गया, लेकिन आखिरकार उन्हें न्याय मिला। यह केस “न्याय में देरी न्याय से इनकार” की कहावत को एक हद तक झुठलाता है क्योंकि अंत में पीड़िता को मुआवजा मिल गया।

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