
Pension Dispute vs Government: केंद्र सरकार के लिए एक बार फिर पेंशन विवाद बड़ी मुसीबत बन गया है। यह मामला 2006 से पहले और बाद में रिटायर होने वाले समान रैंक के अधिकारियों की पेंशन विसंगति से जुड़ा है। अब इस विवाद की वजह से सरकार को 25,000 करोड़ रुपये तक का वित्तीय बोझ उठाना पड़ सकता है।
इस विवाद की शुरुआत 6वें वेतन आयोग (6th Pay Commission) के बाद हुई थी, जिसने पेंशन की गणना को लेकर भारी भ्रम पैदा कर दिया। खास बात यह है कि इस मुद्दे को सुलझाने के लिए अब तक अदालतों में कई बार सुनवाई हो चुकी है, लेकिन अभी भी मामला उलझा हुआ है।
केंद्र सरकार ने वित्त अधिनियम 2025 से बचाव का रास्ता ढूंढा
केंद्र सरकार ने इस विवाद से बचने के लिए Finance Act 2025 में केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियमों में बदलाव किया है। इस अधिनियम के माध्यम से सरकार ने यह अधिकार सुरक्षित कर लिया है कि वह अपने पेंशनभोगियों को वर्गीकृत कर सकती है और उनके बीच अंतर बनाए रख सकती है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि पेंशन निर्धारित करने का आधार कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की तारीख होगी, न कि उनकी सेवा रैंक या योगदान। लेकिन यहीं पर कानूनी पेंच फंस गया है क्योंकि दिल्ली उच्च न्यायालय और पूर्व में सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णय इसके उलट हैं।
डीजी रैंक के अधिकारियों के साथ बड़ा भेदभाव
FORIPSO (Forum of Retired IPS Officers) और S-30 Pensioners Association ने 2006 से पहले रिटायर हुए अधिकारियों के साथ हुए भेदभाव को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। इन संगठनों का कहना है कि समान रैंक (जैसे DG रैंक) पर काम करने के बावजूद, 2006 से पहले रिटायर अधिकारियों को कम पेंशन दी जा रही है जबकि 2006 के बाद रिटायर हुए जूनियर अधिकारियों को ज़्यादा पेंशन मिल रही है।
2008 में सरकार ने जो ऑफिशियल मेमोरेंडम (OM) जारी किया था, उसी को इस भेदभाव का आधार बताया गया है।
CAT और हाईकोर्ट दे चुके हैं सरकार के खिलाफ फैसला
FORIPSO ने इस मामले को सबसे पहले CAT (Central Administrative Tribunal) में उठाया था और 2015 में CAT ने उनके पक्ष में फैसला दिया। इसके बाद भी जब सरकार ने आदेश लागू नहीं किया, तो अवमानना याचिका दाखिल की गई।
20 मार्च 2024 को दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट आदेश में कहा कि सरकार को 01 जनवरी 2006 से प्रभावी पेंशन संशोधन लागू करना होगा और तीन महीने के भीतर बकाया राशि का भुगतान करना होगा।
लेकिन सरकार ने इस आदेश को मानने की बजाय सुप्रीम कोर्ट में SLP (Special Leave Petition) दायर कर दी, जिसे 4 अक्टूबर 2024 को खारिज कर दिया गया। इसके बाद अब अगली सुनवाई 16 मई 2025 को होनी है।
पेंशन भुगतान में देरी से बढ़ रहा वित्तीय बोझ
अगर सरकार को दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश मानना पड़ा तो उसे एक बड़ा वित्तीय झटका लग सकता है। FORIPSO का अनुमान है कि हर एक अधिकारी को औसतन 14.5 लाख से 16.5 लाख रुपये का एरियर देना पड़ेगा।
करीब 300 से अधिक सेवानिवृत्त अधिकारी इस विसंगति से प्रभावित हैं। ऐसे में सरकार पर 25,000 करोड़ रुपये से अधिक का पेंशन बिल आ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का पुराना फैसला बना सरकार के लिए दीवार
सरकार के नए वित्त अधिनियम को अदालत में चुनौती मिल सकती है क्योंकि DS Nakara vs Union of India (1983) के सुप्रीम कोर्ट फैसले में साफ कहा गया है कि सेवानिवृत्ति की तारीख को आधार बनाकर पेंशन में भेदभाव नहीं किया जा सकता।
साथ ही UOI vs SPS Vains (2008) में भी कोर्ट ने कहा था कि समान रैंक के अधिकारियों को पेंशन में समानता मिलनी चाहिए, चाहे वे किसी भी तारीख को रिटायर हुए हों।
कोर्ट के आदेश के बावजूद अब तक नहीं मिला एरियर
सरकार की तरफ से अब तक बकाया पेंशन का भुगतान नहीं किया गया है। इसके चलते FORIPSO ने फिर से अदालत का दरवाजा खटखटाया है और अब 16 मई 2025 को अवमानना याचिका पर सुनवाई होगी।
यदि इस बार भी केंद्र सरकार आदेश लागू नहीं करती तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है।
पेंशन संकट से सरकार कैसे निकलेगी बाहर?
अब सरकार के पास बहुत सीमित विकल्प रह गए हैं। या तो वह अदालत के आदेश को माने और भुगतान करे या फिर वित्त अधिनियम 2025 की वैधता को लेकर एक नई कानूनी लड़ाई लड़े।
हालांकि पेंशन एक संवेदनशील मुद्दा है और इसका सीधा असर सरकार की साख और नैतिक जिम्मेदारी पर पड़ता है। ऐसे में इस मामले में किसी निष्कर्ष तक पहुंचना अब बेहद जरूरी हो गया है।